आस्था और परंपरा का संगम — कोटा संभाग के गांवों में आज भी निकलती है घास भैरू की सवारी

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दशकों पुरानी परंपरा गांवों में आज भी कायम,
कोटा संभाग के कई गांवों में आज निकल गई घास भैरू की सवारी,
कुछ दशक पूर्व तक बैलों को जोतकर निकल जाती थी सवारी,
अब बैलों की जगह रस्सियों के सहारे ग्रामीण खीचकर निकालते है सवारी,
घास भैरू की सवारी की बीच रास्ते में जगह-जगह की गई पूजा

सांगोद /कोटा। वर्षो पुरानी परंपरा का निर्वाहन करते हुए गुरुवार को सांगोद तहसील के डूंगरपुर गांव में शाम को 4 बजे करीब लोक देवता घास भैरू की सवारी निकाली गई। जानकारी के अनुसार दीपावली के बाद भाई दूज के मौके पर कोटा संभाग के कई गांवों में घास भैरू की सवारी निकाली जाती है। ऐसी मान्यता है कि पुराने समय से असाध्य रोगो से बचाव के लिए दूज के मौके पर घास भैरू की सवारी निकाली जाती है। कुछ दशक पहले तक जब किसान बैलों से खेती करते थे। तब बैलों को जोतकर घास भैरू की सवारी निकाली जाती थी। अब रस्सियों के सहारे ग्रामीणों के सहयोग से सवारी निकालते है। मोटामोटी यह कहा जाता है कि घास भैरू को गांव की परिक्रमा करवाइ्र्र जाती है। ताकी कोई गंभीर रोग बराड़ गांव में प्रवेश नही करे। आज के समय पर भले ही मेडिकल ने काफी तरक्की कर ली है। फिर भी हाड़ौती के कई गांवों में आज भी घास भैरू की सवारी निकाली जाती है। सवारी निकालने की परंपरा को अच्छी बारिश का संकेत भी माना जाता है। पहले के समय पर जिस मार्ग से घास भैरू की सवारी को निकाला जाता था। वस मार्ग पर पडऩे वालों मकानों के मुख्य दरवाजे पर लाल कपड़े में मिट्टी को बांधकर टांग देते थे। ताकी कोई बीमारी घर में प्रवेश नही करे। सवार निकालते समय बीच-बीच में घास भैरू की पूजा अर्चना भी की कई।

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