बाड़मेर से अशरफ भाई की रिपोर्ट:-
राजस्थान के बाड़मेर जिले में कालबेलिया समाज सदियों से अपनी धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के साथ जुड़ा हुआ है। परंतु आजादी के 75 वर्ष बाद भी इस समुदाय को अपने मृतकों के सम्मानजनक दाह संस्कार के लिए चार बीघा श्मशान भूमि तक उपलब्ध नहीं हो पा रही है।दुखद यह है कि वह भूमि, जहां कालबेलिया समाज वर्षों से अंतिम संस्कार करता आ रहा था, उस पर वन विभाग ने कब्जा कर गेट लगा कर रास्ता बंद कर दिया है। हाल ही में जब कालबेलिया समाज के एक सदस्य का देहांत हुआ, तो शव लेकर श्मशान घाट पहुंचे लोगों को बंद गेट का सामना करना पड़ा। वन विभाग से अनेक बार अनुरोध करने के बावजूद सुनवाई नहीं हुई।समाज के लोगों ने मजबूर होकर रात के समय शव लेकर जिला कलेक्टर कार्यालय का रुख किया। इस दौरान भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया और पुलिस ने सड़क पर शव रखवा कर प्रशासनिक समझाइश देना शुरू की। प्रशासनिक अधिकारियों की समझाइश के बावजूद समाज का प्रश्न था — “क्या अंतिम संस्कार के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा?”घटना के बाद पूर्व विधायक मेवाराम जैन और रविंद्र सिंह भाटी मौके पर पहुंचे, प्रशासन से वार्ता की और अंततः श्मशान घाट पर सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराया गया।यह स्थिति राजस्थान सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए एक भारी चुनौती है कि वे निजी कंपनियों को रेगिस्तान की हजारों, लाखों बीघा भूमि प्रदान करने के निर्णय के साथ-साथ बाड़मेर के इस कलंक को तत्काल समाप्त करें। कालबेलिया समाज को न केवल उचित और स्थायी श्मशान भूमि का प्रबंध करना आवश्यक है, बल्कि इसके माध्यम से उनके सामाजिक सम्मान की भी रक्षा होनी चाहिए। यह मांग है कि प्रशासन शीघ्रातिशीघ्र इस समस्या का समाधान करते हुए समाज को राहत प्रदान करे, ताकि कोई भी परिवार अपने प्रीयजनों का संघर्ष के बिना सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कर सके।समाज के साथ न्याय, समभाव और अधिकार की अधिष्ठा तभी होगी जब प्रशासन अपने उत्तरदायित्वों को गंभीरता से स्वीकार करेगा।
