कहते हैं कि कठिन परिस्थितियाँ इंसान को तोड़ती नहीं, बल्कि तराशती हैं। कुछ ऐसा ही जीवन रहा है सुरेश भाई का, जिनकी जीवन यात्रा संघर्ष, मेहनत और विश्वास का असाधारण उदाहरण है।
बचपन में ही सिर पर परिवार की ज़िम्मेदारी
04 दिसंबर 1997 को जन्मे सुरेश भाई पांच भाई-बहनों में बड़े है।
माता: लीला देवी
भाई: सुरेश, दिनेश, नौकेश
बहन: सुरमी देवी
साल 2009 उनके जीवन में गहरा सदमा लेकर आया, जब कैंसर से उनके पिताजी का निधन हो गया। उस समय सुरेश इ महज 06वीं कक्षा तक ही पढ़ पाए थे। पिता के निधन ने बचपन छीन लिया और परिवार की सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
संघर्ष की शुरुआत:-
बेहतर भविष्य और परिवार की आर्थिक मजबूती के लिए वे 2010 में सूरत पहुंचे। यहां से उनकी असली संघर्ष यात्रा शुरू हुई।
उन्होंने टेम्पो चलाने से जीवन की दौड़ में पहला कदम रखा।
भारी मेहनत, ईमानदारी और दृढ़ निश्चय ने धीरे-धीरे उन्हें आगे बढ़ाया। दिन-रात मेहनत करने वाले सुरेश भाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

ब्राह्मणी पेपर टुल की स्थापना:-
सात वर्षों की कठिन मेहनत के बाद सुरेश भाई ने 2017 में ‘ब्राह्मणी पेपर टुल’ की स्थापना की। छोटे स्तर से शुरू हुआ यह काम आज सूरत में एक पहचान बना चुका है। मेहनत और लगन का परिणाम यह है कि आज सुरेश भाई के पास एक कार, स्विफ्ट डिज़ायर, दो मालगाड़ियाँ (कमर्शियल ट्रांसपोर्ट व्हीकल) उपलब्ध हैं, जिनसे उनका व्यवसाय लगातार विकसित हो रहा है।
रोजगार प्रदाता :-
सफलता केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए अवसर बनाने का नाम है। इसी सोच से प्रेरित होकर सुरेश भाई आज 10-15 लोगों को रोजगार प्रदान कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज को कुछ लौटाने का तरीका है।
आस्था और संस्कार: सुरेश भाई के जीवन का मजबूत आधार
सुरेश भाई और उनका परिवार अत्यंत आस्तिक और संस्कारी है।
हर वर्ष वे समूह में सोनाणा खेतलाजी के दर्शन करने जाते हैं, जो उनके जीवन में शक्ति, संतुलन और प्रेरणा का स्रोत है।

आज का सुरेश भाई: युवाओं के लिए प्रेरणा
एक लड़का जिसने गरीबी, संघर्ष और जिम्मेदारियों का बोझ झेलते हुए कम उम्र में ही कामकाज संभाला। आज सफल उद्यमी,
रोजगार प्रदाता और समाज के लिए प्रेरणा बन चुका है।
सुरेश भाई की कहानी बताती है कि – “हौसले ऊँचे हों तो रास्ते खुद बन जाते हैं।”
